दैनिक रणघोष के प्लेटफार्म पर पढ़ते रहिए शिक्षा में सुगंध फैलाती कहानियां

बेहतर इंसान बनने की आवाज शिक्षण संस्थानों में अब शोर मचाने लगी है, आइए आरपीएस से पूछते  हैं..


 रणघोष खास. सुभाष चौधरी


  • जिंदगी में संस्कार-  सादगी ओर  समर्पण से परिपूर्ण  शिक्षा व सफलता छोटे – आसान रास्ते  पर चलकर  या किसी का हाथ थामें  नहीं मिलती  । वह तो उस राह पर निकल पड़ती है जिस पर दूर तक शायद ही कोई नजर आता हो।  जैसे  जैसे कदम  आगे बढ़ते हैं चारों तरफ मजाक उड़ाती डरावनी आवाजें उसे वापस लौटने पर  विवश करती है।  यहां मजबूत इरादे ओर बेहतर इंसानी सोच वाले इस शोर पर मुस्कराते हुए आगे बढ़ जाते  हैं ओर परेशान व  विचलित होने वाले वापस वहीं लौट जाते हैं जहां से वे चले थे।

इस लेख में हम बात करेंगे  दक्षिण हरियाणा की माटी से निकली आरपीएस शिक्षण संस्थान की। यह संस्थान  शिक्षा में सुगंध की तरह तेजी से चारों तरफ फैलता जा रहा है। इसकी सफलता  के कई  राज  सार्वजनिक तौर पर इतराते नजर आ रहे हैं तो कुछ खामोशी के साथ आगे बढ़ रहे हैं। अखबार में किसी निजी संस्थान की तारीफ या तो बाजारवाद की शर्तों पर होती है या फिर उस पत्रकार की सोच से निकलती है जिसमें  बेहतर बने रहने या करने की   गुंजाइश रहती  है । हम 18 सालों से अधिक समय से आरपीएस की तरफ से जारी होने वाले प्रेस नोट को देखते एव प्रकाशित करते आ रहे हैं। कोविड-2019 के बाद से इस संस्थान ने तेजी से शिक्षा को लेकर अपने विजन ओर नजरिए को काफी हद तक  शिक्षा की बाजारू दुर्गंध से बचाना शुरू कर दिया है। अब  यह  संस्थान इस बात पर ज्यादा नहीं इतराता की उसके विद्यार्थी ने नंबरों की दुनिया में टॉप किया है। वह इस बात पर हल्ला  मचा रहा है कि उसके तमाम बच्चों मे कुछ ना कुछ बनने या करने के इरादे मजबूत हो रहे हैं।  एक दौर था जब पढ़ाई में अव्वल छात्र स्टार की तरह गुरु व स्कूल का चेहता बनकर विशेष  नजर आता था। अब प्रत्येक छात्र में पढ़ाई  के अलावा उन तमाम खुबियों को खोजा व निखारा जा रहा है जिस पर बाजारू शिक्षा ने पूरी तरह से डॉक्टर्स, इंजनीनियर, आईएएस  जैसे भारी भरकम प्रोफाइल का लेप लाकर उसे पूरी तरह से कुचला व दबाया हुआ था। इस संस्थान के सीईओ मनीष राव के शब्दों में अब  टॉपर की कहानी नहीं बेहतर इंसान बनने की ललक व बैचेनी हिलोरे मारती नजर आती है। मनीष राव समझ चुके हैं समाज को डॉक्टर्स, इंजीनियर, आईएएस बनाकर  देना आसान है लेकिन एक बेहतर इंसान बनाना उतना ही मुश्किल है। राजा दशरथ का  पुत्र राम  कहलाना आसान है लेकिन 14 साल का कठोर वनवास काटकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बनना उतना ही कठिन। एक शिक्षक की अपने विषय पर मजबूत पकड़ अब मायने नहीं रखती उसका  संपूर्ण व्यक्तित्व कितना असर  डालता है यहीं शिक्षा का  असल स्वरूप होता है।  शिक्षा के बाजार में आरपीएस ने बच्चों को जीवन में कुछ भी बनने से पहले बेहतर इंसान बनने के संस्कारों को अपने स्कूल प्रांगण में फैलाना शुरू कर दिया है उसकी तारीफ होनी चाहिए।  हमें उम्मीद है कि सभी शिक्षण संस्थान कुछ ना कुछ इस दिशा में बहुत कुछ शानदार  कर रहे  हैं। इसलिए यह कलम चल पड़ी है उस  स्कूल की तलाश में जहां से बेहतर इंसान बनने की आवाज हमें बुला रही है।