रणघोष खास. पाठक प्रियंका यादव की कलम से
जिला उपायुक्त अशोक कुमार गर्ग की एक सार्थक पहल से पहली बार महिला दिवस महिला सफाई कर्मचारियों को समर्पित रहा। इस मंच पर वास्तविक रूप में महिला दिवस का एहसास हो रहा था ।हम साक्षी बने उन अनसुनी कहानियों का जो अपने आप में ही कुछ कहती हैं।और जिन्हे सुना और समझा जाना चाहिए था।जी हां ये हमारी वहीं सफाई कर्मचारी थी जिनको अक्सर सबने सिर्फ झाड़ू लगाते देखा होगा। मगर मौका मिला तो यही झांसी की रानी बनकर हमारे समक्ष खड़ी थी और कोई विश्वास ही नहीं कर पा रहा था था की रंग बिरंगे कपड़ों में अपनी कलाओं का प्रदर्शन करने वाली वहीं महिलाएं हैं। धन्यवाद उपायुक्त का उस आवाज की आवाज बनने का जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं थी।जो हमेशा केवल मूक दर्शक बनी रही है अपने ऊपर होने वाले दिन प्रतिदिन के अत्याचारों का। आज ये मंच इंतजार कर रहा था बदलाव के उस नये दौर का जब हमारी यही महिला शक्ति लिखेंगी अपनी नयी कहानियां। जी हां ऐसी ही एक कहानी लिखी गयी इस मंच से जब एक महिला कर्मचारी के पति ने समाज की संकीर्ण सोच के कारण उसे कार्यक्रम में भाग लेने से रोक दिया था। मगर यहां मंच पर अपनी एक अलग कहानी कहती प्रतिभाओं को देखकर उस महिला कर्मचारी की आंखें नम हो गयी थी।और मंच से बार बार मिल रहे प्रोत्साहन से हौंसला जुटाकर वो मंच पर पहुंची और बोली मैंम मैं कुछ कहना चाहती हूं। इस मंच से मैं अपने पति से पूछना चाहती हूं कि क्या आगे कार्यक्रम में वो मुझे अपनी कला प्रदर्शन की इजाजत देंगे।क्योंकि मैं भी कुछ करना चाहती हूं।और अपने पति को मंच पर बुलाकर उपायुक्त महोदय के सामने पूछा तो उसके पति ने मंच के माध्यम से कहा कि इसे रोकना मेरी भूल थी और आगे मैं इसे कभी नहीं रोकूंगा। बस हमें हमारे महिला दिवस का मूल मिल गया और दिल से बार बार धन्यवाद निकल रहा था उपायुक्त महोदय के लिए जिन्होंने ये आयोजन कराया और मुझे इस सेवा का अवसर दिया।दिल को बहुत सुकुन मिला।आज एक महिला के सपनों के पंखों को उड़ान मिल गयी।और कितनी ही महिलाओं नेअपनी प्रतिभा के दम पर उस मानसिक संकीर्ण सोच पर आघात कर उसकी नींव को हिला दिया जो इनकी तरक्की में बाधक बनकर खड़ी थी।यहीं तो है वास्तविक रूप में महिला दिवस ।यहां न केवल वो उदाहरण दिए गये जिन्होने बुलंदियों को छू लिया बल्कि वो कहानियां यहां लिखी गयी जो आने वाले दौर में सफलता हासिल करेंगी।