रणघोष की सीधी सपाट बात

आईजीयू में शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहते ओर छात्र पढ़ना,  चैप्टर क्लॉज  


रणघोष खास. सुभाष चौधरी


विशेषतौर से महेंद्रगढ़- रेवाड़ी जिले की इकलौती सरकारी इंदिरा गांधी मीरपूर यूनिवर्सिटी (आईजीयू) को अगर आप शिक्षा का मंदिर, बेहतर भविष्य की आधारशिला, गुरु- शिष्य की गरिमा के स्वरूप जैसे अलंकारों से पारिभाषित करते हैं तो समझ जाइए आप खुद के प्रति ईमानदार नहीं है।

पिछले कुछ दिनों से आईजीयू में छात्र संगठन अपनी मांगों को लेकर आक्रमक नजर आ रहे हैं। प्रदर्शन के समय ये छात्र कम अपने माता- पिता की खून पसीने की कमाई पर नेतागिरी की ब्रांडिग करते ज्यादा नजर आ रहे हैं। इसकी कई वजह है। हरियाणा में भाजपा- जेजेपी की सरकार है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी)  भाजपा का चेहरा है तो इंडियन नेशनल स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन (इनसो) जेजेपी की ताकत के तौर पर नजर आ रही है। राजनीतिक दलों ने अपनी राजनीति जमीन को मजबूत करने के इरादों से इन छात्र ईकाईयों का गठन किया हुआ है। सरकार में होने की वजह से इन छात्र संगठनों के पदाधिकारियों में जोश देखते ही बनता है। इन छात्र नेताओं की मजबूरी है कि वे सड़कों पर जितना ज्यादा शोर मचाएंगे उतना ही अपने पार्टी मुखियाओं के सामने मजबूत दिखेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं की  देश के बड़े शिक्षण संस्थानों की हैसियत अब महज डिग्री के नाम पर कागज के टुकड़े पर मोहर लगाने तक की रह चुकी है। जहां तक पढ़ने – पढ़ाने व शिक्षा के स्तर की बात है। आईजीयू के बहाने हम देश की शिक्षा प्रणाली को आसानी से समझ सकते हैं।   2013 में महर्षि दयानंद विवि रोहतक से अलग होकर आईजीयू की स्थापना हुई थी। करीब 9 साल हो चुके हैं। चार वाइस चांसलर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। गौर करने लायक बात यह है कि इन सालों में शिक्षक के तौर पर जूनियर- सीनियर्स पद कार्यरत कोई प्रोफेसर यह दावा नहीं कर सकता कि वह बेहतर शिक्षा के नाम पर उदाहरण बनकर सामने आया हो। हां वर्कशाप, आयोजन व खुद की प्रतिभा साबित करने में वे जरूर मीडिया में सुर्खियां बटोरते रहे हैं। इसी तरह शायद ही कोई विद्यार्थी गर्व के साथ यह दावा कर सकता है कि उसे आईजीयू में अपना सर्वश्रेष्ठ करने के लिए बेहतर माहौल मिला। इससे उलट शिक्षा की गरिमा एवं पवित्रता खंडित जरूर होती रही। लाखों रुपए वेतन लेने वाले शिक्षक पढ़ाने के नाम पर धड़ों में बंटे हुए हैं। जिसके चलते कुछ सस्पेंड भी हो चुके हैं। कुछ शिक्षकों व अधिकारियों की डिग्री के फर्जी होने पर ही हल्ला मच रहा है। जितने भी वीसी आए उन पर नौकरियां लगाने के नाम पर खेल करने के गंभीर आरोप आज तक लग रहे हैं। पीएचडी के शोधार्थी अपने गाइड के चरित्र पर हमला करते दिख रहे हैं। कुल मिलाकर मीडिया में आईजीयू में बेहतरी के नाम पर व छात्र संगठनों की तरफ से प्रदर्शन करने को लेकर जो तस्वीर दिखाई जा रही है। उसमें शिक्षा की गरिमा एवं गुरु- शिष्य की पवित्रता कहीं भी नहीं है। ऐसे में विद्यार्थियों को चाहिए कि वे इन शिक्षण संस्थानों में कदम रखते समय अपने माता-पिता के संघर्ष को जरूर याद करें। अगर वे ऐसा कर पाए तो वे सड़कों से ज्यादा कक्षाओं में नजर आएंगे ओर शिक्षक गुरु कहलाने की इज्जत को बचाने में सफल होंगे।