होई जबै द्वै तनहुँ इक
जीवन और मृत्यु से परे ( अध्याय 26)
“मेरे लिए असह्य हो गया था, बावरी को ऐसी अवस्था में देख पाना। उसका शरीर प्रतिदिन निष्प्राण हो रहा था, पर चेहरे पर एक चमक थी। आँखें जैसे चारों ओर से मुझे देख रही थी, प्रकाश की किरणों की तरह।”
उसने क्षितिज की ओर देखा, और एक लंबी साँस ली।
“मैंने उसे मुक्ति देने का मन बनाया। तुम्हें लग रहा होगा मैं हत्या के संकल्प को पावित्र्य देने का प्रयास कर रहा हूँ। मगर नहीं, हत्या में एक निकृष्ट उद्देश्य अनिवार्य है। मैं तो बावरी को खोकर अपना सब कुछ खोने जा रहा था।
वह दिन आ गया था। सुबह से हवा मुझे भारी लग रही थी, दोवटी सी। मैंने निश्चित कर लिया था आज बावरी के कष्टमय जीवन का अंतिम दिन है। पर उसके बाद जो हुआ, वह अकल्पनीय है।” उसने रुक कर मुझे सचेत किया।
“बावरी मूक थी, अपनी आवाज़ खोकर। मैं उसे नज़र बचा कर बार बार देख रहा था। मगर हर बार उसे अपनी ओर देखते पाया। मन चाह रहा था कि नज़र भर कर देख लूँ उसे, इन अंतिम घड़ियों में, उसकी साँस बंद करने से पहले। अचानक मुझे सुनाई दिया, ‘त्यारी कर लो, भंवर जी!’ मैं चौंक गया। बावरी चुपचाप मुस्कुरा रही थी। उसकी आवाज़ आई थी, यह मेरा भ्रम नहीं था। मुझे लगा उसने कहीं मेरा मन तो नहीं भाँप लिया है।
“गणगौर पूजण रो मन हो रयो!” अब की बार मैंने देखा तो उसने धीरे से सिर हिलाया। मैं केवल विज्ञान में विश्वास करता हूँ, दोस्त। पर यह चमत्कार मेरी आँखों के सामने हो रहा था। बावरी जो मन में सोच रही थी, मुझे सुनाई दे रहा था।
सोचा, तो क्या उसे भी मेरा मन सुनाई दे रहा है? क्या उसे पता है, मैंने उसकी साँस बंद कर देने का मन बना लिया है? सहमी सी आँखों से मैंने उसकी तरफ देखा, वह फिर मुस्कुरा दी। जैसे कह रही थी, ‘मैं सब जानती हूँ’। वह दिन मेरे जीवन का सबसे अलौकिक दिन था।
मगर गणगौर तो चैत्र में आती है, और यह तो कार्तिक है। मैं सोच ही रहा था कि उसकी आवाज़ आई।
‘आपां समै तैं बाहर आ गया भंवर जी। ये बातां भूल जाओ आज थम। जाओ क्यारियां मा थोड़ी दूब ल्याओ।’
मुझे लग रहा था, यह सत्य नहीं, एक सपना चल रहा है, इस हल्की नीली रोशनी में, प्रकृति की दिनचर्या से बाहर। ना रौशनी, ना अँधेरा, ना धूप, ना छाँव। बीच का सा सब कुछ, किसी दूसरे लोक सा। मैं निष्प्रयास चलता हुआ बाहर गया, दूब लेने। धीमी सी टेर में एक गीत सुनाई दिया। यह मेरे अतीत का स्वर था। भीतर से औरतों के समूहगान की गूंज आ रही थी। उनका स्वर चढ़ रहा था, एक के ऊपर एक, भास एक जैसी थी। यह तो गणगौर का ही गीत था। बावरी की आवाज़ सब से अलग थी।
बचपन में सुना यह गीत मेरी स्मृति में गूँजने लगा। ” बाड़ी आला बाड़ी खोल ….हम आई तेरी दूबां नै….कोण्यां की थम बेटी जी… कोण्यां की थम पोती जी…. ईसर की हम बेटी जी, बिरमा की हम पोती जी…” बाहर देखा तो जगह जगह हरी दूब उगी थी… हम सचमुच समय के घेरे से, ऋतुओं के फेरे से, बाहर निकल गए थे। इन औरतों की आवाजों में बहुत सी वे आवाज़ें थी जो मैंने अपने बचपन में सुनी थी… गणगौर पूजती हुई। मृत्यु का कोई अर्थ नहीं था जैसे। एक द्वार है जो खुलते ही सब काल एक हो जाते हैं; विगत, वर्तमान और आगम।
मैं विभोर हो रहा था। गीत सुनते हुए मैंने दूब चुनी। लौट कर घर की ओर आया तो वे सब दूसरा गीत गा रही थी।
ये कन बोया हे…ये कन सींच दिया!
ईसर बोया हे… बहू गोरां सींच दिया!
आसमान से हल्की हल्की फुहारें गिरने लगी। मेरी आँखों से आँसू बह निकले। आश्चर्य और अभिराम की यह एक अलौकिक अनुभूति थी। मुझे अचानक ख्याल आया, कहीं यह सांसरियों के शापमुक्त होने की घड़ी तो नहीं है। ईसर और गौरा द्वारा इंद्र को पराजित करने का उत्सव। बावरी का संकल्प पूरा होने का उद्यापन।”
उसने मेरी ओर देखा। ” देखो दोस्त, मैं तुम्हारी तरह कोई कहानीकार नहीं हूँ कि अपनी कल्पना से यह सब रच सकूँ। यह मेरा भोगा हुआ सच है, तुम विश्वास करो या नहीं!”
मुझे यह सब एक कहानी सा लगते हुए भी सच लग रहा था। मैं कुछ बोला नहीं, निर्लिप्त भाव से उसे देखता रहा।
वह फिर लीन हो गया। “मैं अंदर आया तो माँ की आवाज़ सुनाई दी। माँ घिरी बैठी थी, सोलह कुआंरियों को गणगौर की कहानी सुना रही थी। बावरी भी थी उनमें, सबसे आगे। यह उसी की गणगौर थी।
” राजा कै बोया जौ चना, माली कै बोई दूब। राजा का जौ चना बढ़ता गया, माली की दूब घटती गई….
मैं अचंभित था, यह घट रहा है या मेरी स्मृतियाँ साकार हो रही हैं। पर दोनों बात एक ही तो हैं।
मैं बावरी की खाट के पास गया। उसकी मुस्कराहट में बहुत कुछ छुपा था।
” जाओ थे नहालो इब, फेर म्हानै बी नुहाओ!”
मैं पाटे पर बैठ कर नहाने लगा तो फिर सब औरतों ने गाना शुरू किया।
‘अलखल अलखल नदी बहवै, यो पानी कित जायेगो, आधो जायगो अली गली में आधो ईसर न्हायगो!’
मेरा ध्यान गीत में छुपे गहरे अर्थ पर गया। दरअसल सारे गीत ब्रह्मा के सृष्टि सृजन और उसके भरण पोषण की ओर संकेत कर रहे थे। मैं नहाते हुए अपनी संस्कृति और रीति रिवाजों में छुपे गूढ़ ज्ञान के बारे में सोचता रहा। बावरी की आसन्न मृत्यु को भूल गया था। बावरी सच कह रही थी, जीवन और मृत्यु से परे, हम एक समागम लोक में थे, जहाँ सब एकत्रित हुए थे, कुछ स्मृति लोक से तो कुछ स्वप्न लोक से, एक अनुष्ठान करके वापस जाने के लिए, अपना जीवन और जीवनातीत भोगने के लिए।
क्रमश: जारी..
