मिलिए 79 साल के एक ऐसे गुरु से जिनकी जिदंगी की कहानी सभी की प्रेरणा बन गईं

कोरोना में अपनी पेंशन रिलीफ फंड में जमा करा दी, जीवन भर अनुशासन को अपनी ताकत बनाए रखा


IMG_20210626_182123रणघोष खास.   सुपौत्री रूपक की कलम से


79 वर्ष केमास्टर बिशंबर दयाल  कोरोना काल में प्रेरणा का स्रोत बने है।  उन्होंने अपने पूरे महीने की पेंशन कोरोना रिलीफ में प्रदान की और कहा कीमेरी ओर मेरी पत्नी चलती देवी की तरफ से एक छोटी सी सहायता से अगर किसी को जिंदगी मिल सके इससे बड़ा पुण्य और क्या होगा। मास्टर जी  गांव बेरली कलां के स्थायी निवासी है। अपने जीवन के कठिन 79 वर्ष मे एक अच्छे इंसान होने के साथ साथ उन्होंने जीवन का सार समझते हुए ओर भी बहुत कठिन, सही निर्णय भी लिए जिससे उन्होंने अपने परिवारिक स्थिति को ही नही सुधारा बल्कि समाज मे शिक्षा पर विशेष जोर डालते हुए एक पहचान भी बनाई। उनका जन्म बहुत ही अधिक गरीब परिवार मे हुआ। पिता किसान थे और दूसरो की जमीन को जोता करते थे। परिवार बड़ा होने की वजह से पेट पालना मुश्किल भरा था। उन्होंने बहुत ही कम उम्र मे परिवार की जिम्मेदारियां अपने ऊपर ले ली थी। सर से पिता का साया उठने के पश्चात मां उनके 6 छोटे भाई बहनों की भी जिम्मेदारिया भी उनपर आगयी थी। वो बताते है कि एक बार बारिश मे उनका छप्पर/झोपड़ी ढह गया था, सब खत्म हो गया था, माताजी चलती देवी, बुढी अम्मा, बच्चो को लेकर जहातहा शरण ली। उन्होंने किसानी के साथ शिक्षा को अपना हथियार बनाया। और बहुत मेहनत और कठिन परिस्थितियों से गुजरते हुए समाज मे खुद को ही नही बल्कि अपने सभी भाई बहनों को भी खड़ा किया। उन्होंने उनके जीवन को एक दिशा दी। आज सभी अपने अपने जीवन में आनंदमय है। मास्टर जी शुरू से गांव के सबसे पढे लिखे आदमी रहे है, उन्होंने दो विषयों मे मास्टर डिग्री हासिल की। उसके बाद बीएड किया। इतिहास उनका पसंदीदा विषय रहा है और राजस्थान विश्विधालय के मेधावी छात्र रहे। उन्होंने राजकीय अध्यापक के रूप मे सेवा प्रदान की। उनके सभी छात्र आज भी उन्हे बहुत याद करते है मिलने के लिए घर भी आते रहते है। मास्टर जी अपने समय मे हाकी के बहुत अच्छे खिलाड़ी रहे हैं। एक बार प्रतियोगीता मे हाकी से चोट लगने के कारण काफी असहनीय पीड़ा झेलनी पड़ी। डॉक्टरो ने ऑप्रेशन बताया था लेकिन इतनी आर्थिक स्थिति अच्छी नही होने से नही करा पाए।  देशी इलाज से समय अनुसार पीड़ा कम हुई। आज भी उनके चेहरे पर वो बड़ा ट्युमर देख सकते है। उनका कहना है किअब हाकी  तो खेल नही सकता पर ये याद बाकी है। हंसते हुए वो बताते है कि पढाई के साथ साथ खेल कूद, योग बहुत जरूरी है। 

 रहन सहन..

 उनका रहन सहन बहुत ही सादगी भरा है। आज भी एक चारपाई साथ मे एक जूट का मुडढा, कुर्सी, दो कुर्ते पायजामे, एक लकड़ी की बेंत और ढेर सारी किताबें, उपन्यास अखबार उनके जीवन का हिस्सा है। 

वो बताते है कि उनके जीवन मे अनुशासन की मुख्य भूमिका रही है। सुबह ब्रहम्मूहरत में उठना, चौकड़ी मारके राम के नाम लेना। 430 पे एक चाय पीना। फिर थोड़ा फ्रेश होकर घूम फिरकर, नियमित रूप से साढ़े 6  बजे से अखबार पढना शुरू करना। जो उनका सबसे मनपसंद समय है। हमेशा खाना टेबल कुर्सी पर नही जमीन पर बैठकर खाते है। जो उनके सिद्धांत मे शामिल है। नाश्ता, 2 समय का हल्का भोजन का भी समय निर्धारित है। उनके लिए बताते है की जब वो खाने बैठते तो पक्षी और जानवर उनकी थाली से खा लेते। सभी से प्यार मोहब्ब्त की और उन्होंने कभी किसी को तुच्छ भावना से नही देखा यही उनका बड़पन्न है। उनके सभी कार्य नियमित रूप से होते है। जिससे चीज़े सरल हो जाती है। कहते हैं कि नई पीढी को किसी भी तरह का नशा नही करना चाहिएभाई! नशा कैसा भी हो बुरा ही होता है उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़े बहुत मीठे कड़वे किस्से सुनाए।  वैसे तो मास्टर जी हर विषय पर खुलकर बात कर लेते है लेकिन इतिहास उनका पसंदीदा विषय रहा है जिसपे वो घन्टों बात कर सकते है। एक बार मैंने एक अलग सी प्रतिभा देखी कि बाबा पूरे अखबार की एक एक पंक्ति पढ़ते है, मेरे दो उपन्यास बहुत ही जल्दी पढ़कर ख़तम कर दिये तो मैंने उनके लिए और उपन्यास लाने शुरू कर दिये। मुझे अब उनकी रुचि भी समझनी थी कि किस तरह की लेखनी ज्यादा पढ़ते है कैसे नही। वो भी समझ आने लगा। आज मास्टर जी के घर मे सभी शिक्षित है, उनके सुपौत्रिया भी मास्टर डिग्री होल्डर है अपने बाबा की तरह।एक रिसर्च के क्षेत्र मे कार्यरत है तो दूसरी फिजिक्स लेक्चरर है। उनके सुपोत्र भी गैट क्वालिफाइड है और कंपनी में कार्यरत है। उनके एक दामाद एआईएस अफसर है और एक हरियाणा पुलिस मे कार्यरत है।

_सामाजिक कार्य 

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उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया उस जमाने मे, कि हर बच्ची को शिक्षित करना हैं। उन्होंने हर बेटी को पढ़ाने पर पूरा जोर दिया।  

रास्ते में चलते समय उनको कही भी कूड़ा दिखे तो तुरंत उठाके सही जगह निस्तारण करते है। उनके लिए स्वछता बहुत जरूरी है। वो कहते है किबच्चे बड़ों से सीखते है। निजी स्वछता के साथ सामाजिक स्वछता अधिक जरूरी है। अपने घर को तो सब साफ करते है, पर अपने आसपास भी सफ़ाई रखना अति आवश्यक है।”  इस तरह हम मास्टर जी की बहुत सी बाते अपने जीवन मे उतार सकते हैं और समाज देश की प्रगति मे सहयोग कर सकते हैं। आज की नई पीढी को उनसे सीखना चाहिए।

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