पेट्रोल-डीजल केंद्र और राज्य सरकरों के लिए कमाई का सबसे बढ़िया ज़रिया है। पिछले सात साल में केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 258 प्रतिशत बढ़ाई है। जबकि डीजल में 820 प्रतिशत बढ़ी है। साल 2014 में पेट्रोल पर प्रति लीटर 9.20 रुपए एक्साइज ड्यूटी थी। आज 32.90 रुपए है। डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 3.46 रुपए थी। आज 31.80 रुपए हो गई है।
रणघोष खास. यूसुफ़ अंसारी
थोक और खुदरा महँगाई दर का आँकड़ा रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुँच चुका है। महँगाई पर क़ाबू पाने का मोदी सरकार के पास फ़िलहाल कोई ठोस उपाय नहीं दिख रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण महँगाई पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ज़रूर कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को सलाह दे रहे हैं कि वो अपनी राज्य सरकारों से पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करने को कहें। लेकिन पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले केंद्रीय कर को कम करने के नाम पर उन्हें और मोदी सरकार के दूसरे मंत्रियों को सांप सूंघ जाता है। रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा है कि कोरोना की दूसरी लहर के बाद ख़राब हुए आर्थिक हालात को दुरुस्त करने के लिए मौद्रिक नीति में बदलाव से लेकर तमाम दूसरे क़दम उठाने की ज़रूरत है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जिनके सिर पर सरकार के साथ मिलकलर महंगाई रोकने के लिए ज़रूरी क़दम उठाने की ज़िम्मेदारी है, वो सिर्फ़ सलाह दे रहे हैं। दो हफ्ते पहले उन्होंने आम जनता को महँगाई से राहत देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों से अपने-अपने हिस्से का टैक्स कम करने की अपील की थी। लेकिन उनकी इस अपील पर न मोदी सरकार का दिल पसीजा और न ही किसी राज्य सरकार के कानों पर ही जूं रेंगी।दरअसल, महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण आए दिन बढ़ने वाले पेट्रोल-डीजल के दाम हैं। नरेंद्र मोदी 50 रुपए प्रति लीटर से कम में पेट्रोल देने का वादा करके सत्ता में आए थे। लेकिन उनके सत्तासीन होने के साल में पेट्रोल 2014 में 71 रुपए प्रति लीटर के मुक़ाबले 100 के पार चला गया है। देश के कई हिस्सों में डीजल के दाम भी सौ रुपए का आँकड़ा पार कर चुके हैं। 2 मई को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद से ही पेट्रोल-डीजल की क़ीमतों मे आग लगी हुई है। 2 मई को चुनावी नतीजे आने के बाद 4 मई को पेट्रोल-डीजल के दाम पहली बार बढ़े थे। मई के महीने में कुल 16 बार दाम बढ़े। जून के महीने में 18 दिन में 10 बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ चुके हैं।
पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का सबसे ज़्यादा असर आम आदमी पर पड़ता है। पेट्रोलियम कंपनियों के एक सर्वे के मुताबिक़ पेट्रोल की सबसे ज़्यादा 61.42 प्रतिशत ख़पत दो पहिया वाहनों में होती है। उसके बाद छोटी और मध्यम कारों में 34 फ़ीसदी ख़पत होती है। जबकि एसयूवी और अन्य लक्ज़री गाड़ियों में सिर्फ़ 2.34 फ़ीसदी ही ख़पत होती है।
पेट्रोल के बढ़ते दामों की सबसे ज़्यादा मार स्कूटी, स्कूटर और मोटर साइकिल इस्तेमाल करने वालों पर होती है। डिलीवरी ब्वाय का काम करने वालों पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ता है। ग़रीब और मध्यम वर्ग पर पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों से दोहरी मार पड़ती है। बार-बार दाम बढ़ने पर प्रत्यक्ष रूप से उनका पेट्रोल पर होने वाला ख़र्च बढ़ जाता है। पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से रोज़मर्रा के इसेतमाल की चीज़ों के दाम बढ़ने से अप्रत्क्ष रूप से उनके घर का पूरा बजट बिगड़ जाता है। हर दूसरे-तीसरे दिन पेट्रोल के 25-30 पैसे मंहगा होने से आम लोगों का ‘तेल’ निकलने लगा है। ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ और ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ जैसे लोकलुभावन नारों की बुनियाद पर बनी मोदी सरकार न तो पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले केंद्रीय कर में कटौती कर रही है और न ही पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने को तैयार है। पिछले चार महीनों में रिज़र्व बैंक कम से कम छह बार केंद्र और राज्य सरकारों से मुद्रास्फीति की दर को काबू में करने के लिए पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले अपने-अपने हिस्से के करों में कटौती करने को कह चुका है। लेकिन उसकी अपील का कोई असर नहीं हो रहा। मार्च की शुरुआत में वित्त मंत्रालय ने पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले केंद्रीय कर में कुछ कटौती की थी। पांच मार्च को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम करने का फ़ैसला केंद्र और राज्यों को मिलकर लेना होगा। लेकिन ये कभी बात आगे नहीं बढ़ी। दरअसल केंद्र और राज्य सरकारों का तर्क है कि कोरोना काल में बढ़े आर्थिक बोझ को कम करने लिए उन्हें पैसों की ज़रूरत है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल पर लगने वाला टैक्स अगर कम कर दिया जाएगा तो कोरोना से लड़ाई कमज़ोर पड़ जाएगी।पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले टैक्स पर फ़िलहाल राजनीति हो रही है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं कि राजस्थान और महाराष्ट्र की राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर सबसे ज़्यादा टैक्स वसूल रही हैं। लोगों को राहत देने के लिए इन्हें अपना टैक्स कम करना चाहिए। लेकिन बीजेपी शासित राज्यों और केंद्र के टैक्स को कम करने के सवाल पर वो चुप्पी साध जाते हैं। पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का मामला भी उठता रहता है। आर्थिक मामलों के कुछ जानकारों का मानना है कि पेट्रोल-डीजल को जीएएसटी के दायरे में लाकर इनकी क़ीमतों को काबू में रखा जा सकता है। मई के आख़िर में हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में यह मुद्दा उठा भी था। लेकिन हक़ीक़त यह है कि न तो केंद्र ही इसके लिए गंभीर है और न ही राज्य सरकारें। ऐसा होने से उनके राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत ही उनके हाथ से निकल जाएगा। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें कम होने के बावजूद आम लोगों को राहत नहीं मिलती। केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकारें वैट लगाकर अपना ख़ज़ाना भर रही हैं। ज़ाहिर है तेल के इस खेल में केंद्र की मोदी सरकार और राज्य सरकारें तो मस्त हैं लेकिन आम आदमी पस्त है।